Sunday, 22 February 2026

रोज़ रोज़ रंग

शाम के मंदिर में
सूरज का संतरी दिया जलता है,

मैं भी काम से लौटता हूं,
सूरज भी चुप्पी की दुनिया में चलता है,

आराम करेगा रात भर,
आग और आवाज़ को शांत कर,

उठेगा फिर पहले पहर
जगमग जगमग जीवन भरने
खोलने जीवन के झरने

रंग खिलाएगा दिन भर,
नचाएगा पृथ्वी को अपने संगीत पर,

फिर जब बीत जाएगा 
दिन का अंतिम पहर,
शांति ओढ़कर सोएगा
जैसे एक मस्त लहर,

अंधेरे में रंग डूबते,
डूबकर शांत होते,
उजाले में रंग खिलते,
खिलकर नाच लेते
नाचकर फिर थकते,
शांति मांगते…

© मनन शील ।

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